Desh ki Bigdi Halat | देश की बिगड़ी हालत

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  • September 10, 2018 4:33 PM
poems

देश की बिगड़ी हुलिया के, हालात लिखा करता हूँ मैं।
मानवता की शैली में, संवाद लिखा करता हूँ मैं।।
देश प्रेमियों की कब्रों पर, झुका हुआ मस्तक हूँ मैं।
राष्ट्र विरोधी अरमानों पर, ख़ौफ़नाक दस्तक हूँ मैं।।
अमर शहीदों की परिपाटी, माटी राजस्थानी है।
हल्दी की वो घाटी , राणा की बलिदानी है।।
वीर शहीदों का गरिमामय, विश्वास लिखा करता हूँ मैं।
उनके ही बलिदानों का इतिहास लिखा करता हूँ मैं।।
देश की बिगड़ी हुलिया -------------------------------------

जलियाँवाला बाग में, वो क्या ह्रदय विदारक मंजर था।
डायर के नालायकपन का , वो बेहूदा खंजर था।।
लेकिन राष्ट्र भक्ति की धारा, रोक कहाँ वो पाया था।
मरने वले हर सैनिक ने, इंकलाब दोहराया था।।
आज यहाँ हम अत्त्याचारी, संसद में पनपाते है।
धता बताकर वो जनमत को, मंत्री तक बन जाते हैं।।
रंगे सियारों की स्याही को, रोज धोया करता हूँ मैं।
पंगु व्यवस्था की पेंदी में , छेद किया करता हूँ मैं।।
तुष्टिकरण की राजनीति, क्यों पग पग बढ़ती जाती है।
कुर्सी केवल वोट बैंक की , भाषा क्यूँ सिखलाती है।।
नाकारा निकम्मी राजनीति पर, बंध लिखा करता हूँ मैं।
जर्जर फटी व्यवस्था के, पैबंद सिला करता हूँ मैं।।
देश की बिगड़ी हुलिए के-----------------------------------

विश्वगुरु की धरती पर, क्यों अंधकार के डेरे हैं।
मुल्ला, मौलवी, पंडा सारे, अंधे, गूंगे, बहरे हैं।।
प्रेम-मोहब्बत की राहों पर, यहां नफरत के पहरे हैं।
अपने-अपने सिर है सबके, अपने-अपने सहरे हैं
त्यौहारों के मौके पर भी, साजिश के रंग गहरे है।
रखी की मर्यादा के यहाँ, फिरते रोज लुटेरे हैं।।
बेहाल सिसकती कलियों के , जज़्बात लिखा करता हूँ मैं।
जज़्बातों की अर्थी के, अहसास लिखा करता हूँ मैं।।
देश की बिगड़ी हुलिया -------------------------------------

By S.K. Upadhyay




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Priyanka October 21, 2018 1:36 AM

It's Really good