poems
देश की बिगड़ी हुलिया के, हालात लिखा करता हूँ मैं।
मानवता की शैली में, संवाद लिखा करता हूँ मैं।।
देश प्रेमियों की कब्रों पर, झुका हुआ मस्तक हूँ मैं।
राष्ट्र विरोधी अरमानों पर, ख़ौफ़नाक दस्तक हूँ मैं।।
अमर शहीदों की परिपाटी, माटी राजस्थानी है।
हल्दी की वो घाटी , राणा की बलिदा


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यदि आप पहनकर चलोगे ईमानदारी का पुराना झंगा,
तो घर में रहेगा दंगा,बच्चियां रहेंगी भूखी, बच्चा रहेगा नंगा।

और बीवी -
गांठ बांध लो,कमर कस लेगी
तुम्हें नंबर वन का मूर्ख कहेगी।

यहां तक तो तुम जहर पीलोगे,मर मर के जी लोगे,
बीवी को धमकाओगे ,बच्चों को आंख दिखाओगे।



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संसद में हंगामा हो गया ,
जब अधिवेशन के दौरान,
एक सांसद का पायजामा खो गया।

विपक्ष ने शोर मचाया ,
इल्जाम सत्ता पक्ष पर आया।

जबाव में सत्ता पक्ष के सांसद उठे,
गला फाड़ कर चिल्लाने लगे -
“ये विपक्ष की साजिश है सरकार को बदनाम करने की”,
थोड़ा तो ख्याल कर


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ठन गई! मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटक


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मोहब्बत की सिम वाला, मोबाइल मेरा दिल है
यकीं नहीं तो देखो, मेरे पास पक्का बिल है|
स्कीम के लालच में सिम तो डलवा ली,
नेटवर्क बिजी है आज कल मुश्किल है|

मैन्युअल सलेक्ट करो,नेटवर्क तो पूरे हैं,
एक बार भी बात होने के अरमां अभी अधूरे हैं|
ऑटोमैटिक सलेक्ट करो, तो रोमिंग काट ज


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अपना घर तक जला डाला मैंने औरों के वास्ते।
अपनी हर तमन्ना पर कफन डाला औरों के वास्ते।

बस रोने की बात पर हँसकर आंसू पोछ डाले।
हर गम एक तराना बना डाला औरों के वास्ते।

हमें चमन में आशियाना न मिला तो क्या हुआ।
गुल खिलने तो जरूरी है किसी बुलबुल के वास्ते।

किसी के भी


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कर्फ्यू चलता रहा, फ्लैग मार्च होती रही।
क्रूरता के गलियारों में, मानवता रोती रही।

रामो रहीम की बेदी को, सुलगाती रही साजिशें।
मेरे चमन की फ़िज़ा, कालिख मई होती रही।

जलती रही बस्तियाँ, आसमा तपता रहा।
लाचार बन जिंदगी, मौत को ढोती रही।

देखते ही देखते, लाशों के


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क्यूँ खून के रिश्ते भी आज पानी हो गये।
क्यूँ आदमी के दिल भी आज जापानी हो गये।

बिखरें हैं जिंदगी के मूल्य आज इस तरह।
मानवता के पाठ बस कहानी हो गए। क्यूँआदमी के दिल....

जिए या मारें यहाँ किसको है पड़ी।
मौत के शबब भी यहाँ शैतानी हो गए। क्यूँआदमी के दिल....

खोखल


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प्रजातंत्र का गन्ना राजनीती की ऐसी चरखी में पिल रहा है ।
आम आदमी को चूसा हुआ छिलका, और खास को रस मिल रहा है।

नेता कोठियों में काजू और संतरी दरवाजों पर संतरे छील रहे हैं।
सबसे बड़े प्रजातंत्र में,आज भी करोड़ों बच्चे कूड़े के ढेर से प्लास्टिक के टुकड़े बीन रहे हैं। <